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इंटरनेट की दुनिया और हमारी हिंदी

पोस्टेड ओन: 5 Jan, 2010 टेक्नोलोजी टी टी में

हिंदी की वेबसाइटों की संख्या जिस अनुपात में बढ़ रही है उसी अनुपात में इसके पाठकों की संख्या भी बढ़ रही है। लेकिन अभी हिंदी को नेट पर बहुत लंबा सफ़र तय करना है।

इसके मार्ग में अनेक तकनीकी बाधाएँ हैं। इन बाधाओं के बारे में आगे बात करेंगे। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में दुनिया बहुत तेज़ी से सिकुड़ती और पास आती जा रही है। वैश्विक ग्राम की अवधारणा के पीछे सूचना क्रांति की शक्ति है। इस प्रक्रिया में इंटरनेट की भूमिका असंदिग्ध है। जहाँ दुनिया भर में पाठकों की संख्या का ग्राफ़ नीचे आया है, वहीं सूचना क्रांति को किताब पर छाए ख़तरे के रूप में भी देखा जा रहा है। इलेक्ट्रानिक माध्यमों में इंटरनेट एक ऐसा माध्यम हैं, जहाँ कथा साहित्य बहुतायत में उपलब्ध हो सकते हैं। इसका अर्थ है कि इंटरनेट पर कोई भी कृति इंटरनेट पाठक वर्ग के लिए डाउनलोड की जा सकती है। इससे वेब पीढ़ी के पाठक तो अनमोल साहित्य और वैचारिक पुस्तकों से जुड़ेंगे ही, साथ में पुस्तक के वर्तमान स्वरूप में एक नया आयाम भी जुड़ेगा। इस दिशा में प्रयास हुए भी हैं, उदाहरण के तौर पर माइक्रोफ़िल्म को सामने रखते हैं। ख़ास अर्थो में यह भी पुस्तक की परिभाषा में एक नया आयाम तो जोड़ती है, लेकिन महँगाई और जटिल तकनीक के कारण इसकी पहुँच सीमित है, जबकि इंटरनेट का फैलाव विश्वव्यापी है। सही मायनों में किताब के व्यापक प्रसार की प्रक्रिया पंद्रहवी शताब्दी में प्रिटिंग प्रेस के आविष्कार के बाद से ही आरंभ हुई थी। इसने ज्ञान पर कुछ विशिष्ट लोगों के एकाधिकार को तोड़ा और आम जन के लिए ज्ञान की नई दुनिया के द्वार खोले। अब यही काम इंटरनेट भी कर रहा है, लेकिन ज़्यादा तीव्रता से और व्यापक स्तर पर, इंटरनेट ने सूचना या ज्ञान पर एकाधिकार को तोड़ा और विकेंद्रित किया है। विश्वव्यापी संजाल (वर्ल्ड वाइड वेब जो संक्षेप में डब्ल्यू.डब्ल्यू.डब्ल्यू. कहलाता है) के ज़रिए इंटरनेट उपयोगकर्ता दुनिया भर की कैसी भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार जो कार्य प्रिटिंग मशीन के आविष्कार से आरंभ हुआ था, उसे इंटरनेट ने विस्तार ही दिया है, अतिशय सूचना की समस्या और इस पर किसी एक ही व्यक्ति विशेष के वर्चस्व के प्रश्न को निश्चित ही अनदेखा नहीं किया जा सकता, इस ओर सावधान रहने की आवश्यकता है। जहाँ तक इंटरनेट पर साहित्यिक कृतियाँ उपलब्ध कराने की बात है, तो यह प्रकाशकों और साहित्यकारों की इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है। प्रारंभिक दौर में हम पीछे रह गए हैं। इंटरनेट की उपयोगिता को सबसे पहले विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं ने ही समझा टाइम्स आफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, नई दुनिया, इंडिया टुडे, आउटलुक जैसी पत्रिकाओं ने अपने इंटरनेट संस्करण निकालने आरंभ किए, इससे निश्चित ही इन पत्र-पत्रिकाओं की पाठक संख्या बढ़ी है। ‘द स्टेट आफ द साइबरनेशन’ पुस्तक के लेखक नील वैरट के अनुसार, इंटरनेट के संदर्भ में ‘पाठ’ को तीन भागों मे बाँटा जा सकता है। तात्कालिक महत्व के समाचार-परक लेख, जैसे दैनिक समाचार पत्र। पृष्ठभूमीय समाचार-परक लेख (बैकग्राउंडर), जिनकी उपयोगिता अपेक्षाकृत कम समयबद्ध होती है जैसे साप्ताहिक और मासिक पत्रिकाएँ। स्थायी महत्व का कथा और अ-कथा साहित्य, यानी किताबें। इंटरनेट पर पूरी किताब उपलब्ध करवाना बाइट का खेल है। (बाइट : कंप्यूटर में डेटा सुरक्षित रखने की आधारभूत इकाई, जिसमें एक बाइट आठ बिट के बराबर होती है), अधिकांश समाचार-परक लेखों की शब्द संख्या एक हज़ार शब्दों से कम होती है, पत्रिकाओं में छपने वाले लेखों की पाँच हज़ार शब्दों से कम, पूरे समाचार-पत्र या किसी पत्रिका को कंप्यूटर पर डाउनलोड करने में औसतन चालीस से पचास हज़ार शब्द लग सकते हैं। पुस्तकें इंटरनेट पर उपलब्ध करवाने में औसतन अस्सी हज़ार शब्द लगेंगे, यद्यपि यह संख्या तुलनात्मक रूप से अधिक प्रतीत होती है, लेकिन पूर्णत: व्यवहार्य है। कंप्यूटर की भाषा में कहें तो बिना चित्रों की अस्सी हज़ार शब्दों वाली किताब में मात्र 0.5 मेगाबाइट खर्च होंगे। पुस्तकों के पाठकों की संख्या में आई गिरावट के इस दौर में इंटरनेट हमें एक नया पाठक वर्ग पैदा करने का अवसर देता है। तकनीकी विकास के साथ किताब का स्वरूप भी बदला है। हम जिस रूप में किताब को आज पाते हैं वह पहले से ऐसी नहीं थी। लेकिन तब तक से लेकर अब तक उसके होने पर कोई विवाद नहीं रहा। हाँ। तकनीक का विरोध औद्योगिक क्रांति के समय से ही कमोबेश होता रहा है। विक्टोरियन इंग्लैंड में कवि और समाज सुधारक विलियम मौरिस एक समय प्रिंटिंग प्रेस के सख़्त विरोधी थे। उनकी नज़र में इससे किताब के सौंदर्य और भव्यता पर आँच पहुँचती थी। स्पष्टत: यह एक अभिजातवादी दृष्टिकोण है। हिंदी के रचनाकारों की समस्या है कि वह तकनीक का कोई सकारात्मक उपयोग प्राय: अपने लिए नहीं पाते। क्या यह स्थिति इसलिए है कि वें एक पिछड़े समाज के प्रतिनिधि हैं? किसी भी तकनीक के दो पहलू हुआ करते हैं। एक अच्छा तो दूसरा बुरा। बुरे का विरोध और अच्छे का अपने पक्ष में उपयोग ही उचित है, न कि कोरे विरोध के द्वारा स्वयं को इससे असंयुक्त कर लेना। किताब का जो वर्तमान स्वरूप हमारे सामने है, उसमें किताब की अपनी स्वायत्त सत्ता होती है और पाठक की स्वायत्तता के खिलाफ़ इसकी दख़लअंदाज़ी बहुत सीमित होती है। मगर ऐसा ही इंटरनेट उपयोगकर्ता के साथ भी है। वह जब चाहे तब कंप्यूटर का स्विच आफ़ कर सकता है। हाँ! यह अवश्य है कि लैप टॉप सरीखे महँगे कंप्यूटर का उपयोग नदी किनारे बैठकर कोई साहित्यिक कृति पढ़ने के लिए नहीं किया जा सकता। यह कंप्यूटर की सीमा भी है। लेकिन तकनीक सुलभ और सस्ती हो, तो भविष्य में कुछ भी संभव है। इंटरनेट पर साहित्य उपलब्ध होने से कुछ विधा संबंधी परिवर्तन आना तय है। उदाहरण के लिए, जिस प्रकार पत्रकारिता के दबावों के चलते रिपोर्ताज, धारावाहिक लेखन सरीखी विधाएँ सामने आई, उसी तरह कुछ नवीन विधाएँ इंटरनेट पर जन्म ले सकती है। सचित्र लेखन, कार्टून जिसका एक रूप है, उसकी तर्ज़ पर एक्शन भरा लेखन सामने आ सकता है। फ़िल्म और साहित्य के बीच की कोई विधा विकसित हो सकती है। ऑन लाइन फ़रमाइशी लेखन की संभावना भी बनती है। इंटरनेट पर सहकारी यानी सामूहिक लेखन के प्रयास भी हो सकते हैं। अब प्रश्न उठता है कि क्या इंटरनेट पर गंभीर साहित्य की रचना संभव है या फिर यह सिर्फ़ पॉपुलर साहित्य तक ही सिमट जाएगा, इस प्रश्न का उत्तर भविष्य ही दे सकता है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इंटरनेट स्वयं संप्रेषण माध्यम की अंतिम कड़ी नहीं हैं। वैज्ञानिक खोजें किसी एक बिंदु पर आकर नहीं रुकतीं, टेलीप्रिंटर के आने से संप्रेषण माध्यम में एक नया आयाम जुड़ा और बाद में यह रेडियो के विकास की कड़ी बना। हालाँकि अपने स्वतंत्र रूप में टेलीप्रिंटर आज भी बना हुआ है। इतिहास बताता है कि मशीन पर किताब छपने से क्लासिक की परिभाषा और किताब का स्वरूप, दोनों ही बदले हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध होने वाले साहित्य को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। कुल मिलाकर इंटरनेट-साहित्य किताब की परिभाषा में कुछ नया ही जोड़ता है।



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pritish1 के द्वारा
June 15, 2012

नमस्ते……. कुलदीप जी आपका लेखन अच्छा लगा मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है…..कुछ है समय में मैं अपनी kahani ऐसी ये कैसी तमन्ना है भाग २ प्रकाशित करूँगा…….आप इसका पहला भाग मेरे ब्लॉग पर देख सकते हैं.. कृपया अपने सुझावों से मुझे अवगत करैं…..

dineshaastik के द्वारा
June 15, 2012

बचपन की यादों की बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति….

    kuldeepsinghbais के द्वारा
    June 17, 2012

    नमस्कार दिनेश जी आपके प्रोत्साहन के लिये धन्यवाद् आशा हैं की आप आगे भी मुझे प्रोत्साहित करते रहेंगे

kuldeepsinghbais के द्वारा
June 15, 2012

thanks for comments Punita ji……………………… यह मेरी पहली कविता है……………. i hope……….aap aage bhi mera margdarshan karte rahenge

Punita Jain के द्वारा
June 14, 2012

बचपन की यादें प्रस्तुत करती सुन्दर कविता |




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